विश्लेषण · संविधान और आयोग

पांच सवाल, जिनके जवाब ज़रूरी हैं

2023–26 की घटनाएं कहां संविधान, चुनाव क़ानून और चुनाव आयोग (ECI) के अपने कर्तव्यों से टकराती हैं, और सुप्रीम कोर्ट इस बारे में पहले क्या कह चुका है। यह पेज विश्लेषण है, क़ानूनी सलाह नहीं। हर सवाल में क़ानूनी आधार, कमी, चुनाव आयोग का जवाब और यह बताया गया है कि मामला किससे सुलझेगा।

1

फ़ैसला आयोग ने लिया या एक व्यक्ति ने?

अनुच्छेद 324टी.एन. शेषन (1995)2023 अधिनियम

क़ानून क्या कहता है

अनुच्छेद 324 चुनाव की ज़िम्मेदारी चुनाव आयोग को सौंपता है, जो एक पद नहीं बल्कि एक निकाय है। टी.एन. शेषन बनाम भारत संघ (1995) में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि बहु-सदस्यीय आयोग जहां तक संभव हो सर्वसम्मति से, वरना बहुमत से फ़ैसला करता है। कोर्ट ने आयोग की शक्तियां एक व्यक्ति के हाथ में रहने के ख़िलाफ़ चेताया भी था। 2023 का अधिनियम भी यही कहता है, और कोर्ट ने 5 अक्टूबर 2026 को यह बात दोहराई।

कहां भटकाव है

तीन में से दो आयुक्तों ने उन आदेशों, अपीलों और फ़ॉर्म में बदलावों पर कम से कम 14 लिखित आपत्तियां दर्ज कीं, जिनके बारे में उनका कहना है कि वे उनके बिना जारी किए गए। अगर ये उनकी आपत्ति के बावजूद लागू हुए, तो हो सकता है कि ये आयोग के फ़ैसले ही न हों।

चुनाव आयोग का जवाब

अलग-अलग राय होना सामान्य विचार-विमर्श है, और हर अंतिम फ़ैसला सर्वसम्मति से हुआ।

2

क्या चुनाव आयोग क़ानून बदले बिना मतदाता बनने की शर्तें बदल सकता है?

अनुच्छेद 326अनुच्छेद 14मोहिंदर सिंह गिल (1978)निर्वाचक रजिस्ट्रीकरण नियम

क़ानून क्या कहता है

अनुच्छेद 326 हर वयस्क नागरिक को वोट का अधिकार देता है और अयोग्यता की अनुमति सिर्फ़ "समुचित विधानमंडल द्वारा बनाए गए किसी क़ानून के तहत" देता है। फ़ॉर्म 6 निर्वाचक रजिस्ट्रीकरण नियमों में तय है, जिनमें सिर्फ़ सरकार संशोधन कर सकती है। मोहिंदर सिंह गिल मामले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अनुच्छेद 324 के तहत चुनाव आयोग की शक्ति क़ानून की कमियों को भरती है, लेकिन क़ानून को दरकिनार नहीं कर सकती।

कहां भटकाव है

ऑनलाइन फ़ॉर्म 6 घोषणापत्र और माता-पिता के मतदाता सूची विवरण के बिना जमा नहीं हो पाता था। इससे असल में पात्रता की एक नई जांच जुड़ गई। दो आयुक्तों ने कहा कि इसके लिए नियम में बदलाव ज़रूरी था। कोर्ट ने 5 अक्टूबर को कहा कि उसने किसी संशोधित फ़ॉर्म 6 को मंज़ूरी नहीं दी है।

चुनाव आयोग का जवाब

फ़ॉर्म 6 ख़ुद नहीं बदला है। घोषणापत्र SIR की एक अलग शर्त है, जिसका आदेश सर्वसम्मति से दिया गया और जिसे मई 2026 के फ़ैसले में बरक़रार रखा गया।

3

सबूत का भार किस पर है, नागरिक पर या राज्य पर?

अनुच्छेद 326लाल बाबू हुसैन (1995)जनप्रतिनिधित्व अधिनियम 1950

क़ानून क्या कहता है

लाल बाबू हुसैन (1995) में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि जो लोग पहले से मतदाता सूची में हैं, उनके पात्र होने की उपधारणा की जाती है, और उन्हें नोटिस और निष्पक्ष सुनवाई के बिना हटाया नहीं जा सकता। 1950 का अधिनियम आपत्ति और जांच के ज़रिए नाम हटाने का प्रावधान करता है।

कहां भटकाव है

SIR में ज़्यादातर नाम मसौदा चरण में हटाए गए, फ़ॉर्म वापस न करने या घर पर न मिलने के कारण, और किसी व्यक्ति के अपात्र होने का अलग से कोई निष्कर्ष नहीं निकाला गया। जिन मतदाताओं की मैपिंग नहीं हुई, उन्हें दस्तावेज़ों से पात्रता साबित करनी पड़ी। रिपोर्टों के मुताबिक़ हटाए गए नाम असमान रूप से बंटे हैं: बिहार में महिलाओं के और बंगाल की "तार्किक विसंगति (logical discrepancy)" श्रेणी में मुसलमानों के ख़िलाफ़।

चुनाव आयोग का जवाब

मई 2026 के फ़ैसले ने यह दलील ख़ारिज कर दी कि SIR नागरिकता की उपधारणा को नकारता है। जिसका भी नाम छूटा है, वह दोबारा आवेदन या अपील कर सकता है, और कोई पक्षपात नहीं है।

4

मतदाता सूची पर नियंत्रण किसका है: क़ानून में नामित अधिकारी का या केंद्रीय सॉफ़्टवेयर का?

जनप्रतिनिधित्व अधिनियम 1950, धारा 13Bअपील, धारा 24

क़ानून क्या कहता है

1950 के अधिनियम की धारा 13B हर निर्वाचन क्षेत्र की मतदाता सूची तैयार करने की ज़िम्मेदारी निर्वाचक रजिस्ट्रीकरण अधिकारी (ERO) को देती है। नाम जोड़ना, नाम हटाना और अपील, सब कुछ इसी अधिकारी और नामित अपीलीय प्राधिकारियों के ज़रिए होता है।

कहां भटकाव है

रिपोर्टों के मुताबिक़ ERO से ERONet की शक्तियां छिन गईं; केंद्रीय प्रणालियों ने "तार्किक विसंगति (logical discrepancy)" के फ़्लैग बनाए, कथित तौर पर AI की मदद से; गोवा में सॉफ़्टवेयर कुछ सत्यापित मतदाताओं के नाम बहाल नहीं कर सका; और बंगाल में चुनाव आयोग के नाम से 16 लाख अपीलें दायर की गईं, आरोप है कि राज्य मुख्य निर्वाचन अधिकारी की जानकारी के बिना।

चुनाव आयोग का जवाब

ECINet से सटीकता और सेवा बेहतर होती है। 26 सितंबर से इसकी समीक्षा हो रही है कि यह अधिनियमों और नियमों के अनुरूप है या नहीं।

5

क्या रेफ़री स्वतंत्र है, और स्वतंत्र दिखता भी है?

मूल ढांचाअनुच्छेद 324(5)अनूप बरनवाल (2023)अनुच्छेद 19

क़ानून क्या कहता है

सुप्रीम कोर्ट स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव को संविधान के मूल ढांचे का हिस्सा मान चुका है। अनूप बरनवाल (2023) में उसने संसद के क़ानून बनाने तक एक स्वतंत्र चयन पैनल ज़रूरी किया था। अनुच्छेद 324(5) मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) को हटाने से बचाता है, सिवाय उसी तरीक़े के जिससे सुप्रीम कोर्ट के जज को हटाया जाता है।

कहां भटकाव है

2023 के अधिनियम ने पैनल की 3 में से 2 सीटें सरकार को दीं, और यह तब पारित हुआ जब विपक्ष वॉकआउट कर चुका था या निलंबित था। मौजूदा सभी आयुक्त इसी के तहत चुने गए, जबकि इसकी चुनौती लंबित है। चुनाव आयोग ने चुनावी रिकॉर्ड तक जनता की पहुंच सीमित की और फ़ुटेज रखने की अवधि घटा दी। हटाने के नोटिस बिना बहस के ख़ारिज कर दिए गए, और शांतिपूर्ण विरोध की रक्षा के लिए कोर्ट को दख़ल देना पड़ा।

चुनाव आयोग और सरकार का जवाब

70 साल तक कार्यपालिका द्वारा चयन ही चलन था, और अधिनियम वैध क़ानून है। रिकॉर्ड से जुड़े बदलाव मतदाताओं की निजता की रक्षा करते हैं, और पुलिस ने क़ानून के दायरे में काम किया।

साझा कड़ी

हर सवाल उन रिकॉर्ड पर टिका है जो चुनाव आयोग के पास हैं, लेकिन उसने प्रकाशित नहीं किए: कार्यवृत्त, हटाए गए नामों के आंकड़े, सॉफ़्टवेयर के नियम और अपीलों की अनुमतियां। अब सिर्फ़ सुप्रीम कोर्ट ही सक्रिय रूप से इन्हें मांग रहा है। चुनाव आयोग के जवाब दाख़िल करने के बाद आने वाले उसके फ़ैसले, किसी भी पक्ष के बयान से ज़्यादा, इस मामले को सुलझाएंगे।

यह पेज सार्वजनिक रिपोर्टिंग और उद्धृत फ़ैसलों पर आधारित विश्लेषण है। पुराने फ़ैसलों के सारांश सरल किए गए हैं; उन पर भरोसा करने से पहले लिंक किए गए मूल पाठ पढ़ें।