जब खिलाड़ी ही रेफ़री नियुक्त करें, भारतीयों से छिनता मताधिकार

भाजपा के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार ने भारत के चुनाव आयुक्तों को चुनने का तरीका कैसे बदला, नए क़ानून के तहत किसे नियुक्त किया गया, और मतदाताओं के देशव्यापी पुनः पंजीकरण का समय चुनावी कैलेंडर के हिसाब से कैसे तय किया गया। सार्वजनिक रिपोर्टिंग के आधार पर 11 अक्टूबर 2026 को संकलित।

एक नज़र में

कड़ियाँ कैसे जुड़ती हैं

  1. दिसंबर 2023मुख्य चुनाव आयुक्त के चयन के नियम बदलेसमिति में सरकार की सीटें

    नए क़ानून ने मुख्य न्यायाधीश की जगह एक मंत्री को रखा, जिससे आयुक्त चुनने वाली समिति में सरकार को 3 में से 2 सीटें मिलीं।

    क़ानून
  2. मार्च 2024 – फ़रवरी 2025नए आयुक्त चुने गए3 में से 3मौजूदा सदस्य नए क़ानून के तहत चुने गए

    नेता प्रतिपक्ष की असहमति के बावजूद ज्ञानेश कुमार फ़रवरी 2025 में मुख्य चुनाव आयुक्त बने।

    लोग
  3. जून 2025 – अब तकमतदाता सूचियाँ दोबारा बनीं~11.7 करोड़नाम अब तक सूची से बाहर

    SIR 32 राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों में हुआ। हर चरण बड़े चुनावों से 4–5 महीने पहले शुरू किया गया।

    SIR
  4. अक्टूबर 2025 – अगस्त 2026आयोग के भीतर असहमति14+लिखित आपत्तियाँ, बाकी दो आयुक्तों की ओर से

    कई विवादित क़दम फिर भी आगे बढ़े। चुनाव आयोग का कहना है कि सभी फ़ैसले सर्वसम्मति से हुए।

    असहमति
  5. सितंबर – अक्टूबर 2026जाँच के घेरे में3मोर्चे: सुप्रीम कोर्ट, संसद, सड़क

    बिना अंतरिम राहत के कोर्ट का नोटिस, लंबित हटाने का नोटिस और दिल्ली में विरोध प्रदर्शन।

    सवाल-जवाब

हर सूची का कितना हिस्सा हटा

बिहार पायलट · अंतिम6.0%
चरण 2 · 12 राज्य · अंतिम10.2%
चरण 3 · 19 राज्य · ड्राफ़्ट~17%

पट्टी की लंबाई 0–20% के पैमाने पर। बिहार: 7.89 करोड़ में से 47 लाख; चरण 2: 50.99 में से 5.18 करोड़; चरण 3 अभी ड्राफ़्ट है और लोगों के दोबारा नाम जुड़वाने पर बदलेगा।

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2023 – 2026 · संसद और अदालतें

चयन समिति में बदलाव

2023 से पहले आयुक्तों को अकेले सरकार चुनती थी। मार्च 2023 में सुप्रीम कोर्ट ने अंकुश के तौर पर नेता प्रतिपक्ष और मुख्य न्यायाधीश को इसमें जोड़ा। कुछ महीने बाद सरकार ने मुख्य न्यायाधीश की जगह अपना मंत्री रख दिया, जिससे सरकार का 2–1 बहुमत फिर बहाल हो गया। विपक्ष ने विधेयक का विरोध किया; फिर भी सरकार ने इसे पारित करा लिया। राज्यसभा में विपक्ष के वॉकआउट के बाद ध्वनिमत से, और लोकसभा में तब, जब विपक्ष के 146 सांसद निलंबित थे।

पहले · 1950 – मार्च 2023
प्रधानमंत्री के नेतृत्व वाली केंद्रीय कैबिनेट सिफ़ारिश करती हैउसी सलाह पर राष्ट्रपति नियुक्ति करते हैं

चयन पर कोई क़ानून नहीं था। अनुच्छेद 324 ने यह संसद पर छोड़ा था, जिसने 73 साल तक कोई क़ानून नहीं बनाया।

सुप्रीम कोर्ट की अंतरिम व्यवस्था · मार्च – दिसंबर 2023
प्रधानमंत्रीनेता प्रतिपक्षभारत के मुख्य न्यायाधीश

3 में से 1 सरकार का। यह व्यवस्था सिर्फ़ तब तक के लिए थी, जब तक संसद क़ानून न बना ले।

बाद में · 2023 का अधिनियम
प्रधानमंत्रीनेता प्रतिपक्षप्रधानमंत्री द्वारा चुने गए केंद्रीय कैबिनेट मंत्री

3 में से 2 सरकार के। क़ानून मंत्री की खोज समिति नामों की सूची छोटी करती है, और चयन समिति इस सूची से बाहर का नाम भी चुन सकती है।

विरोध हुआ, फिर भी पारित

  • आपत्ति: विपक्षी दलों ने कहा कि मुख्य न्यायाधीश को हटाने से सुप्रीम कोर्ट का सुरक्षा उपाय पलट गया और चुनाव कौन चलाएगा, इसका नियंत्रण सरकार के हाथ में चला गया।
  • राज्यसभा, 12 दिसंबर 2023: मंत्री के जवाब के बाद विपक्ष ने वॉकआउट किया; विधेयक ध्वनिमत से पारित हुआ, कोई मत-विभाजन दर्ज नहीं हुआ।
  • लोकसभा, 21 दिसंबर 2023: सरकार के बहुमत से पारित, जब दोनों सदनों के 146 विपक्षी सांसद निलंबित थे और सदन में लगभग कोई विपक्ष नहीं बचा था।
  • सरकार का पक्ष: संसद वही कमी पूरी कर रही थी जिसे भरने के लिए ख़ुद अदालत ने कहा था, और 1950 से कार्यपालिका द्वारा चयन ही चलन रहा है।

क़ानून क्या कहता है · 2023 का अधिनियम संख्या 49

धारा 7, चयन समिति: प्रधानमंत्री (अध्यक्ष), लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष (या सबसे बड़े विपक्षी दल के नेता), और प्रधानमंत्री द्वारा नामित एक केंद्रीय कैबिनेट मंत्री। इसकी सिफ़ारिश पर राष्ट्रपति नियुक्ति करते हैं।

धारा 6, खोज समिति: इसकी अध्यक्षता क़ानून मंत्री करते हैं और इसमें सचिव स्तर के दो अधिकारी होते हैं; यह पाँच नामों की सूची बनाती है। चयन समिति इस सूची से बाहर के व्यक्ति को भी चुन सकती है।

लागू 28 दिसंबर 2023 · इसने चुनाव आयोग (सेवा शर्तें) अधिनियम, 1991 की जगह ली।

मूल दस्तावेज़ · भारत का राजपत्रअधिसूचित अधिनियम, 29 दिसंबर 2023आधिकारिक राजपत्र PDF मूल दस्तावेज़ · India Code2023 का अधिनियम संख्या 49सरकार का आधिकारिक क़ानून डेटाबेस मूल दस्तावेज़ · विधेयक का पाठपेश किया गया विधेयक, अगस्त 2023PRS Legislative Research के ज़रिए मूल दस्तावेज़ · अधिनियम का पाठअधिनियम का पूरा पाठSupreme Court Observer पर उपलब्ध प्रति विश्लेषण · PRSविधेयक का सारहर प्रावधान का आसान भाषा में सार मूल दस्तावेज़ · सुप्रीम कोर्टअनूप बरनवाल मामले का रिकॉर्ड24 नवंबर 2022 का आदेश, उस सुनवाई से जिसके बाद मार्च 2023 का फ़ैसला आया विश्लेषणअनूप बरनवाल मामला समझिए2023 में संविधान पीठ ने क्या फ़ैसला दिया विश्लेषण · ADRसुप्रीम कोर्ट 2023 के क़ानून पर सवाल क्यों उठा रहा हैइस मामले के एक प्रमुख याचिकाकर्ता की ओर से विश्लेषण · The Leafletसंसद ने CJI को हटाने वाला विधेयक पारित कियाप्रावधान-दर-प्रावधान पड़ताल
  1. सुप्रीम कोर्ट ने अंतरिम समिति तय की

    अनूप बरनवाल मामले में अदालत ने कहा कि जब तक संसद क़ानून नहीं बनाती, प्रधानमंत्री, नेता प्रतिपक्ष और CJI आयुक्तों को चुनेंगे।

  2. सरकार ने अपना विधेयक पेश किया

    CJI की जगह प्रधानमंत्री की पसंद का एक मंत्री रखा गया, जिससे समिति में सरकार को 2–1 का बहुमत मिल गया।

  3. राज्यसभा ने ध्वनिमत से पारित किया

    मंत्री के जवाब के बाद विपक्ष ने वॉकआउट किया। उच्च सदन में सरकार के पास अपने दम पर बहुमत नहीं था।

  4. विपक्ष के 146 सांसद निलंबित

    संसद की सुरक्षा में चूक को लेकर हुए विरोध के दौरान दोनों सदनों में निलंबन।

  5. लोकसभा ने पारित किया

    ज़्यादातर विपक्षी सदस्य निलंबित थे। 28 दिसंबर को राष्ट्रपति की मंज़ूरी मिली और इसे राजपत्र में 2023 के अधिनियम संख्या 49 के रूप में प्रकाशित किया गया (आधिकारिक पाठ)।

  6. सुप्रीम कोर्ट ने अधिनियम पर रोक लगाने से इनकार किया

    अदालत ने चुनौतियों की सुनवाई के दौरान नए क़ानून या मार्च 2024 की नियुक्तियों पर रोक लगाने से इनकार किया।

  7. चुनौती को बड़ी पीठ को भेजने पर पीठ बँटी

    न्यायमूर्ति दत्ता ने मामले को बड़ी पीठ को भेजने का केंद्र का अनुरोध ठुकरा दिया; न्यायमूर्ति शर्मा ने इसे स्वीकार किया। अब बड़ी पीठ पर फ़ैसला मुख्य न्यायाधीश करेंगे। अधिनियम की वैधता पर अभी फ़ैसला नहीं हुआ है।

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2024 – 2025 · नियुक्तियां

नए क़ानून के तहत पहले आयुक्त

आयोग के सभी मौजूदा सदस्य नए पैनल ने चुने हैं।

  1. ज्ञानेश कुमार और सुखबीर सिंह संधू चुनाव आयुक्त नियुक्त

    नए पैनल का पहली बार इस्तेमाल हुआ। सहकारिता मंत्रालय के पूर्व सचिव कुमार 15 मार्च को कार्यभार संभालते हैं। अगले ही दिन लोकसभा चुनाव का कार्यक्रम घोषित होता है।

  2. मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) राजीव कुमार सेवानिवृत्त

    उन्हें हटाया नहीं गया। CEC छह साल या 65 वर्ष की उम्र तक पद पर रहते हैं, और वे 65 के हो गए थे। वे मई 2022 से आयोग का नेतृत्व कर रहे थे।

  3. ज्ञानेश कुमार CEC बने; विवेक जोशी चुनाव आयुक्त बने

    पैनल 17 फ़रवरी की शाम कुमार को चुनता है। यह अधिनियम पर सुप्रीम कोर्ट की तय सुनवाई से पहले होता है। नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी असहमति नोट दर्ज करते हैं। 2023 के अधिनियम के तहत चुने गए पहले CEC कुमार 19 फ़रवरी को कार्यभार संभालते हैं। उनका कार्यकाल 26 जनवरी 2029 तक है।

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2025 – 2026 · मतदाता सूची

विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR), और यह कब हुआ

मतदाता सूची हर साल संशोधित होती है, लेकिन पूरी सूची नए सिरे से बनाना दुर्लभ है: पिछली बार ऐसा 2002–04 में हुआ था। कुमार के नेतृत्व में आयोग ने देशभर में तीन चरणों में यह काम किया। हर चरण किसी बड़े दौर के राज्य चुनावों से कुछ महीने पहले शुरू हुआ। स्वतंत्र विश्लेषणों के अनुसार, पश्चिम बंगाल में मुसलमानों और बिहार में महिलाओं के नाम अनुपात से ज़्यादा हटाए गए; चुनाव आयोग (ECI) किसी भी पक्षपात से इनकार करता है।

चरणआदेशअगला चुनावी पड़ावअंतरमतदाता सूची में बदलाव

ज़्यादातर "हटाए गए नाम" उन लोगों के हैं जिन्होंने फ़ॉर्म वापस नहीं किया या गणना के महीने में घर पर नहीं मिले। ये अपात्रता के व्यक्तिगत निष्कर्ष नहीं हैं। चुनाव आयोग ने चरण 2 और 3 के लिए हटाए गए नामों के साथ जोड़े गए नाम प्रकाशित नहीं किए हैं, इसलिए लोगों के दोबारा नाम दर्ज कराने पर शुद्ध आंकड़े घट सकते हैं।

किनके नाम हटाए गए: पैटर्न

स्वतंत्र विश्लेषणों के अनुसार, पश्चिम बंगाल में मुसलमानों और बिहार में महिलाओं के नाम अनुपात से ज़्यादा हटाए गए। चुनाव आयोग किसी भी पक्षपात से इनकार करता है। मतदाता सूची में धर्म दर्ज नहीं होता, इसलिए समुदाय से जुड़े आंकड़े इस पर टिके हैं कि शोधकर्ताओं ने नामों से धर्म का अनुमान लगाया। किसी अदालत या स्वतंत्र ऑडिटर ने इन निष्कर्षों की जांच नहीं की है।

पश्चिम बंगाल · नंदीग्राम

पूरक सूची से हटाए गए 95% नाम मुसलमानों के थे

SABAR इंस्टीट्यूट के अनुसार, नंदीग्राम की पूरक मतदाता सूची से हटाए गए 2,826 नामों में से 2,700 मुसलमानों के थे। इस सीट पर मुसलमान मतदाताओं का लगभग 25% थे।

पश्चिम बंगाल · पूरा राज्य

असंतुलन एक ही श्रेणी में है: "तार्किक विसंगति (logical discrepancy)"

सामान्य श्रेणियों (अनुपस्थित, स्थानांतरित, मृत, दोहराव) में हटाए गए नाम मोटे तौर पर आबादी के अनुपात में थे। "न्यायनिर्णयन के अधीन (under adjudication)" श्रेणी में 27 लाख हटाए गए नामों में से लगभग 17.7 लाख मुसलमानों के थे। भवानीपुर में सामान्य श्रेणियों में हटाए गए नामों में मुसलमान 22% थे, लेकिन "तार्किक विसंगति" श्रेणी में लगभग 52%। यह श्रेणी बंगाल में इस्तेमाल हुई, बिहार में नहीं। कुल मिलाकर, 90.6 लाख हटाए गए नामों में मुसलमान लगभग 34% थे, जबकि आबादी में उनका हिस्सा 27% है।

पश्चिम बंगाल · नतीजे

160 सीटों पर हटाए गए नाम जीत के अंतर से ज़्यादा

यूनिवर्सिटी ऑफ़ वॉरिक के एक अर्थशास्त्री के अनुसार, जिन 49 सीटों पर सिर्फ़ न्यायनिर्णयन से हटाए गए नाम ही जीत के अंतर से ज़्यादा थे, वहां औसत मुस्लिम हिस्सा 38% था, जबकि राज्य में यह 27% है। उनका निष्कर्ष: SIR ने सत्ता-विरोधी लहर पैदा नहीं की, बल्कि उसे बढ़ाया। उनके सतर्क मॉडल में भी भाजपा बहुमत जीतती है।

बिहार · महिलाएं

पुरुषों से 7.6 लाख ज़्यादा महिलाओं के नाम हटे

पहले महीने में 36.6 लाख महिलाओं और 29.3 लाख पुरुषों के नाम हटाए गए। मतदाता सूची में लिंगानुपात गिरकर प्रति 1,000 पुरुषों पर 892 महिलाएं रह गया, जो अब तक का सबसे कम है। मृत्यु के आधार पर हटाए गए नामों में महिलाएं पुरुषों से ज़्यादा थीं, जबकि राज्य में दर्ज मौतों में लगभग 60% पुरुष हैं। शादी के बाद दूसरी जगह जाने से इस अंतर का कुछ हिस्सा समझा जा सकता है, लेकिन मृत्यु के आंकड़े नहीं।

बिहार · मुसलमान

सीमांचल में ज़्यादा नाम बाहर

अंतिम मतदाता सूची के विश्लेषणों के अनुसार, मुसलमानों के नाम बाहर होने की दर ज़्यादा रही, और मुस्लिम-बहुल सीमांचल क्षेत्र सबसे ज़्यादा प्रभावित हुआ। सबसे कम लिंगानुपात वाली दो सीटें भी मुस्लिम-बहुल थीं।

अंतरराष्ट्रीय

संयुक्त राष्ट्र के विशेष प्रतिवेदकों ने चिंता जताई

1 मई 2026 को अल्पसंख्यक मुद्दों, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और धार्मिक स्वतंत्रता पर संयुक्त राष्ट्र के विशेष प्रतिवेदकों ने भारत को पत्र लिखा। उन्होंने नंदीग्राम, AI से चिह्नित "अनियमितताओं" और भारतीय मुसलमानों को अवैध प्रवासियों से जोड़ने वाली बयानबाज़ी का ज़िक्र किया। सरकार ने महीनों बाद पत्र मिलने की बात स्वीकार की। एक नागरिक मंच ने राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (NHRC) में भी याचिका दी है।

चुनाव आयोग का जवाब

  • अधिकारी नंदीग्राम समेत किसी भी पक्षपात से इनकार करते हैं। उनका कहना है कि मतदाताओं को नाम हटाने को चुनौती देने के पर्याप्त मौक़े मिले।
  • SIR का मक़सद सभी पात्र नागरिकों के नाम जोड़ना और दोहराव वाले, मृत, स्थानांतरित, अनुपस्थित और विदेशी मतदाताओं के नाम हटाना है।
  • आयोग का कहना है कि प्रक्रिया पारदर्शी और संवैधानिक है, और सुप्रीम कोर्ट ने इसका समर्थन किया है। इन्हीं आधारों पर उसने संयुक्त राष्ट्र प्रतिवेदकों की चिंताओं के ख़िलाफ़ SIR का बचाव किया।
  • सुप्रीम कोर्ट में आयोग ने दलील दी कि बंगाल में ट्रिब्यूनल के फ़ैसलों से नतीजे नहीं बदले। इसके लिए उसने उन सीटों का हवाला दिया जहां न्यायनिर्णयन से हटाए गए नाम जीत के अंतर से कम थे।

इसे कितना वज़न दें

बंगाल का निष्कर्ष सबसे ठोस है: सिर्फ़ बंगाल में इस्तेमाल हुई एक श्रेणी ज़्यादातर असमानता के लिए ज़िम्मेदार है। लेकिन मुख्य विश्लेषण वकालत से जुड़े या अनाम शोधकर्ताओं के हैं, जो नामों के आधार पर अनुमान लगाते हैं, और कुछ प्रकाशित आंकड़ों में तालमेल बैठाना मुश्किल है। चुनाव आयोग ने लिंग, श्रेणी या इलाक़े के हिसाब से हटाए गए नामों का ब्योरा ऐसे रूप में जारी नहीं किया है जिससे कोई सीधे उनकी जांच कर सके। यह डेटा प्रकाशित होने से विवाद का बड़ा हिस्सा सुलझ जाएगा।

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अक्टूबर 2025 – अक्टूबर 2026 · आयोग के भीतर

दो आयुक्तों ने फ़ाइल पर आपत्ति दर्ज की

द इंडियन एक्सप्रेस ने 23 सितंबर 2026 को रिपोर्ट किया कि संधू और जोशी ने कम से कम 14 ऐसे फ़ैसलों पर आपत्ति दर्ज की, जो उनके मुताबिक़ उनके बिना लिए गए।

  1. पहली आपत्ति

    पूरे आयोग के बिना आयोग के नाम पर आदेश जारी किए गए।

  2. पंजीकरण अधिकारियों की पहुंच छिनी; ECINet शुरू

    राज्यों के निर्वाचक रजिस्ट्रीकरण अधिकारी (ERO) ERONet पर नाम जोड़ने और बहाल करने के अधिकार खो देते हैं। ECINet 22 जनवरी को शुरू होता है। दोनों चुनाव आयुक्त बाद में मतदाता सूची डेटाबेस पर केंद्रीकृत नियंत्रण को लेकर चेतावनी देते हैं।

  3. बंगाल में अपीलें

    बंगाल के ट्रिब्यूनलों के सामने SIR से जुड़ी 38 लाख अपीलों में से 16 लाख मतदाताओं के नाम जोड़ने को चुनौती देती हैं। एक याचिका के मुताबिक़, दोनों चुनाव आयुक्तों या राज्य मुख्य निर्वाचन अधिकारी की जानकारी के बिना चुनाव आयोग के नाम पर अपीलें दायर की गईं।

  4. फ़ॉर्म 6 पर आपत्तियां

    नए मतदाताओं के ऑनलाइन फ़ॉर्म में पहले एक अनिवार्य घोषणापत्र, फिर पुरानी मतदाता सूची और माता-पिता से जुड़े सवाल जोड़े गए। चुनाव आयुक्तों का कहना है कि नियमों में संशोधन किए बिना फ़ॉर्म नहीं बदला जा सकता।

  5. कैबिनेट सचिव को पत्र

    यह काम के उस बंटवारे के बारे में था जिससे आईटी विभाग की निगरानी उनसे हट गई। चुनाव आयोग का कहना है कि पत्र प्रतिनियुक्ति पर आए एक अधिकारी से जुड़ा था।

  6. चुनाव आयोग का संयुक्त जवाब

    तीनों के हस्ताक्षर से: फ़ैसले सर्वसम्मत थे, अब एजेंडा और बैठकों का ब्योरा जारी होगा, और ECINet की क़ानूनी अनुपालन के लिए समीक्षा होगी।

  7. सुप्रीम कोर्ट ने नोटिस जारी किया

    फ़ैसले सर्वसम्मति से या बहुमत से होने चाहिए। कोर्ट का कहना है कि उसने किसी संशोधित फ़ॉर्म 6 को मंज़ूरी नहीं दी है। मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) के ख़िलाफ़ कोई अंतरिम राहत नहीं। एक हफ़्ते में जवाब देना है।

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मई – अक्टूबर 2026 · ज़मीनी हालात

विरोध प्रदर्शन, और कॉकरोच जनता पार्टी इनमें कैसे शामिल हुई

मई 2026 में शुरू हुआ एक व्यंग्यात्मक ऑनलाइन आंदोलन, एक्सप्रेस की रिपोर्ट के कुछ ही दिनों के भीतर मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) के ख़िलाफ़ सड़क पर सबसे बुलंद आवाज़ बन गया। उसने 48 घंटे का अल्टीमेटम दिया, फिर लोगों को दिल्ली के जंतर मंतर पर बुलाया। प्रशासन ने निषेधाज्ञा, मेट्रो और इंटरनेट बंद करके और बड़े पैमाने पर लोगों को हिरासत में लेकर जवाब दिया। 9 और 11 अक्टूबर को सुप्रीम कोर्ट ने दख़ल दिया।

CJP कौन हैं

कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) को डिजिटल रणनीतिकार अभिजीत दिपके ने 16 मई 2026 को व्यंग्य के तौर पर ऑनलाइन शुरू किया था। यह नाम भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) की उस टिप्पणी का जवाब है, जिसमें कुछ बेरोज़गार युवाओं को "कॉकरोच" कहा गया था। साथ ही यह "BJP" पर भी तंज़ है। यह कोई पंजीकृत पार्टी नहीं है। एक हफ़्ते के भीतर इसके इंस्टाग्राम फ़ॉलोअर 2 करोड़ पार कर गए। दिपके पहले आम आदमी पार्टी (आप) की सोशल मीडिया टीम में स्वयंसेवक रह चुके हैं। आलोचक इसी आधार पर इसे राजनीतिक नाटक बताते हैं।

  1. ऑनलाइन व्यंग्य के रूप में CJP की शुरुआत

    भारत के मुख्य न्यायाधीश की "कॉकरोच" वाली टिप्पणी के एक दिन बाद शुरू हुई। पाँच दिन से कम समय में इंस्टाग्राम पर 1 करोड़ से ज़्यादा फ़ॉलोअर हो गए, जो भाजपा के आधिकारिक हैंडल से भी ज़्यादा थे।

  2. सरकार ने इसका X अकाउंट ब्लॉक किया

    आईटी मंत्रालय ने राष्ट्रीय सुरक्षा का हवाला देते हुए धारा 69A के तहत भारत में CJP का X अकाउंट रोक दिया। कुछ ही मिनटों में एक नया हैंडल सामने आ गया। दिपके ने इस रोक को दिल्ली हाई कोर्ट में चुनौती दी।

  3. सड़क पर पहली परीक्षा: परीक्षा पेपर लीक

    CJP ने नीट 2026 पेपर लीक के ख़िलाफ़ प्रदर्शनों की अगुवाई की, जिसमें 20 जून से जंतर मंतर पर धरना भी शामिल था। जुलाई में शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने इस्तीफ़ा दे दिया।

  4. मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) को 48 घंटे का अल्टीमेटम

    एक्सप्रेस की रिपोर्ट के एक दिन बाद CJP ने माँग की कि ज्ञानेश कुमार 48 घंटे के भीतर इस्तीफ़ा दें। फिर उसने ऐलान किया कि अगर वे ऐसा नहीं करते तो 2 अक्टूबर से प्रदर्शन होंगे। कांग्रेस ने अलग से राज्यों के चुनाव कार्यालयों तक मार्च का आह्वान किया।

  5. देशभर में विपक्ष के प्रदर्शन

    कांग्रेस और उसके सहयोगियों ने एक हफ़्ते तक प्रदर्शन किए। युवा कांग्रेस ने दिल्ली में प्रदर्शन किया।

  6. गांधी जयंती: दिल्ली में 700 से ज़्यादा हिरासत में लिए गए

    पुलिस ने अनुमति नहीं दी, धारा 163 लागू की और जंतर मंतर के आसपास इंटरनेट बंद कर दिया। 700 से ज़्यादा लोग हिरासत में लिए गए, जिनमें आप के आतिशी और संजय सिंह, आइसा की नेहा बोरा और योगेंद्र यादव शामिल थे। मुंबई के शिवाजी पार्क में 75 साल के एक प्रदर्शनकारी की दिल का दौरा पड़ने से मौत हो गई। दिपके ने सबको 10 अक्टूबर को दिल्ली बुलाया।

  7. रोज़ मार्च और उत्पीड़न की शिकायतें

    प्रदर्शनकारी हर दिन लौटते रहे। 4 अक्टूबर को लगभग 120 लोग हिरासत में लिए गए। तीन महिला पत्रकारों का आरोप है कि पुलिस ने उनका यौन उत्पीड़न किया या उनसे बदसलूकी की। उनकी शिकायतें क्राइम ब्रांच को भेजी गईं। निषेधाज्ञा तोड़ने के लिए पुलिस ने तीन एफ़आईआर दर्ज कीं।

  8. इंडिया गठबंधन के सांसदों का चुनाव आयोग तक मार्च

    राहुल गांधी और मल्लिकार्जुन खड़गे की अगुवाई में, फ़ॉर्म 6 पर सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणियों के अगले दिन।

  9. पहले से हिरासत; सुप्रीम कोर्ट ने बंदी पर लगाम लगाई

    CJP का दावा है कि प्रदर्शन से पहले देशभर में 10,000 से ज़्यादा लोगों को हिरासत में लिया गया। इस दावे की पुष्टि नहीं हुई है। राजस्थान पुलिस ने उसके प्रवक्ता को हिरासत में रखने से इनकार किया। लगभग 11,000 अतिरिक्त केंद्रीय जवान तैनात किए गए। 9 अक्टूबर को सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि मेट्रो पूरी तरह बंद नहीं होनी चाहिए और पाबंदियाँ अनुपात में होनी चाहिए।

  10. "जंतर मंतर 2.0": हज़ारों लोग हिरासत में लिए गए

    45 मेट्रो स्टेशन बंद रहे, लगभग 245 ट्रेनें रद्द हुईं और जंतर मंतर के 4 किलोमीटर के दायरे में इंटरनेट बंद कर दिया गया। दिपके, सौरव दास और आशुतोष रांका को दिल्ली पहुँचते ही हिरासत में ले लिया गया। ध्रुव राठी को गुरुग्राम में उनके घर पर हिरासत में लिया गया। हिरासत में लिए गए लोगों में ममता बनर्जी, अरविंद केजरीवाल, योगेंद्र यादव और बृंदा करात भी शामिल थे। मुंबई में लगभग 600 लोग हिरासत में लिए गए, जिनमें तुषार गांधी भी थे। पुलिस के मुताबिक़ पथराव में दो अधिकारी घायल हुए। आँकड़े 2,000 से ज़्यादा (गृह मंत्रालय, रॉयटर्स के हवाले से) से लेकर 7,000 से ज़्यादा (मीडिया) तक हैं। CJP के नेताओं को छोड़कर ज़्यादातर लोगों को उसी रात रिहा कर दिया गया।

  11. संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार कार्यालय ने रिहाई की अपील की; भारत ने ख़ारिज किया

    संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार कार्यालय ने भारत से मनमाने ढंग से हिरासत में लिए गए लोगों को रिहा करने और शांतिपूर्ण सभा के अधिकार का सम्मान करने को कहा। विदेश मंत्रालय ने इसे "अनुचित" और अस्वीकार्य दख़लअंदाज़ी बताया। मंत्रालय ने कहा कि पुलिस ने क़ानून के दायरे में काम किया।

  12. सुप्रीम कोर्ट: क़ानून के बिना कोई हिरासत नहीं

    शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों को क़ानूनी प्रक्रिया के बिना हिरासत में नहीं लिया जा सकता। मेट्रो और रेल सामान्य रूप से चलनी चाहिए। इंटरनेट चालू रहेगा। बैरिकेड की समीक्षा होनी चाहिए। वकीलों और पत्रकारों को रोका नहीं जाना चाहिए। अगली सुनवाई 13 अक्टूबर को होगी। CJP का कहना है कि उसका प्रदर्शन जारी रहेगा। आइसा की नेहा बोरा को कनॉट प्लेस में फिर से हिरासत में लिया गया।

स्थिति तेज़ी से बदल रही है। हिरासत के आँकड़े अलग-अलग स्रोतों में काफ़ी अलग हैं और अक्सर इनकी पुष्टि नहीं हुई है। ख़बरों के मुताबिक़, 11 अक्टूबर तक CJP के नेता अब भी हिरासत में थे।

अलग पेज SIR, फ़ॉर्म 6 और फ़ॉर्म 7: आसान भाषा में मतदाता सूची के पुनरीक्षण के तीन तरीके, हर फ़ॉर्म का काम, SIR में नाम कैसे जुड़ता या कटता है, क्या बदला, और सुप्रीम कोर्ट ने क्या खारिज किया और क्या बरकरार रखा। पेज खोलें अलग पेज CEC के रूप में कुमार का कार्यकाल: उन्होंने क्या आगे बढ़ाया, किसने आपत्ति की, क्या हुआ छह विवादित क़दमों पर आपत्तियों का ट्रैकर, उनकी मौजूदा स्थिति, और उनके 20 महीनों की बाक़ी सभी घटनाओं की तारीख़वार टाइमलाइन। पेज खोलें विश्लेषण पाँच सवाल, जिनके जवाब ज़रूरी हैं जहाँ ये घटनाएँ संविधान और चुनाव आयोग की ज़िम्मेदारियों से टकराती हैं: हर सवाल का क़ानूनी आधार, आयोग का जवाब और किस बात से फ़ैसला होगा। पेज खोलें

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सवाल और जवाब

आयोग, SIR और इस विवाद के बारे में लोग जो कुछ पूछते हैं, उसके जवाब सबूतों के साथ। खोजें या विषय के हिसाब से देखें।

आयोग और उसके सदस्य

तीन चुनाव आयुक्त कौन हैं?

ज्ञानेश कुमार (मुख्य चुनाव आयुक्त) केरल कैडर के 1988 बैच के IAS अधिकारी और पूर्व सहकारिता सचिव हैं। वे मार्च 2024 से चुनाव आयुक्त और 19 फ़रवरी 2025 से मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) हैं। उनका कार्यकाल 26 जनवरी 2029 तक है।

सुखबीर सिंह संधू मार्च 2024 से चुनाव आयुक्त हैं। विवेक जोशी हरियाणा कैडर के 1989 बैच के IAS अधिकारी और हरियाणा के पूर्व मुख्य सचिव हैं। वे फ़रवरी 2025 से चुनाव आयुक्त हैं।

क्या पिछले मुख्य चुनाव आयुक्त राजीव कुमार को हटाया गया था?

नहीं। मुख्य चुनाव आयुक्त छह साल या 65 साल की उम्र तक, जो पहले हो, पद पर रहते हैं। राजीव कुमार मई 2022 से आयोग का नेतृत्व कर रहे थे। 65 साल के होने पर उन्होंने 18 फ़रवरी 2025 को पद छोड़ा। अगले दिन सबसे वरिष्ठ चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को पदोन्नत किया गया।

अब आयुक्तों की नियुक्ति कैसे होती है, और क्या बदला?

मार्च 2023 में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि जब तक संसद क़ानून नहीं बनाती, तब तक प्रधानमंत्री, नेता प्रतिपक्ष और भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) की समिति आयुक्तों को चुनेगी। संसद के 2023 के अधिनियम ने मुख्य न्यायाधीश की जगह प्रधानमंत्री द्वारा चुने गए एक केंद्रीय कैबिनेट मंत्री को रख दिया। अब तीन में से दो सीटें सरकार के पास हैं।

यह नियम मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्त (नियुक्ति, सेवा शर्तें और पदावधि) अधिनियम, 2023 (2023 का अधिनियम संख्या 49) की धारा 7 में है।

2023 का क़ानून पास कराने के लिए संख्या किसके पास थी?

लोकसभा में भाजपा के पास अकेले बहुमत था (543 में से लगभग 290), और एनडीए के पास 330 से ज़्यादा सीटें थीं। राज्यसभा में भाजपा सबसे बड़ी पार्टी थी, लेकिन एनडीए अकेले बहुमत से कम था।

व्यवहार में किसी भी सदन में मज़बूत विपक्ष के सामने वोटिंग नहीं हुई। विपक्ष के वॉकआउट के बाद राज्यसभा ने 12 दिसंबर 2023 को ध्वनिमत से विधेयक पास किया। लोकसभा ने इसे 21 दिसंबर को पास किया, जब दोनों सदनों के 146 विपक्षी सांसद निलंबित हो चुके थे।

क्या 2023 के क़ानून को अदालत में चुनौती दी गई है?

हाँ। सुप्रीम कोर्ट ने मार्च 2024 में इस पर रोक लगाने से इनकार कर दिया था। 23 सितंबर 2026 को दो जजों की पीठ इस पर बँट गई कि चुनौती को बड़ी पीठ के पास भेजा जाए या नहीं: न्यायमूर्ति दत्ता ने कहा नहीं, और न्यायमूर्ति शर्मा ने कहा हाँ। अब भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) तय करेंगे कि मामला आगे कैसे चलेगा। क़ानून की वैधता पर अभी कोई फ़ैसला नहीं आया है।

क्या विपक्ष ने ज्ञानेश कुमार की नियुक्ति पर आपत्ति जताई थी?

हाँ। नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी, जो समिति में सरकार से बाहर के अकेले सदस्य थे, ने असहमति नोट दिया। उनका तर्क था कि फ़ैसला इस क़ानून पर सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई तक रुकना चाहिए, जो कुछ ही दिन बाद होनी थी।

क्या मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाया जा सकता है, और क्या किसी ने कोशिश की है?

मुख्य चुनाव आयुक्त को सिर्फ़ सुप्रीम कोर्ट के जज की तरह हटाया जा सकता है: साबित दुर्व्यवहार या अक्षमता के आधार पर, दोनों सदनों में विशेष बहुमत से। अब तक के पहले नोटिस 12 मार्च 2026 को दिए गए, जिन पर लोकसभा के 130 और राज्यसभा के 63 सांसदों के हस्ताक्षर थे। स्पीकर और सभापति ने 6 अप्रैल को इन्हें ख़ारिज कर दिया। 24 अप्रैल को 73 सांसदों का एक नया राज्यसभा नोटिस दिया गया, जो लंबित है।

SIR: यह क्या है और कैसे काम करता है

विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) क्या है?

मतदाता सूची को पूरी तरह नए सिरे से बनाना। मौजूदा सूची में सुधार करने के बजाय, हर पंजीकृत मतदाता को गणना फ़ॉर्म लौटाकर, और कई मामलों में दस्तावेज़ देकर, फिर से योग्यता साबित करनी होती है। जो ये कदम पूरे नहीं करता, उसका नाम नई मतदाता सूची में नहीं आता।

क्या यह नियमित प्रक्रिया है? पिछली बार कब हुई थी?

मतदाता सूची हर साल एक हल्के "संक्षिप्त पुनरीक्षण" से अपडेट होती है। पूरा गहन पुनरीक्षण कभी-कभार होता है। पिछला 2002–04 में हुआ था (बिहार में 2003 में), और वही मतदाता सूची अब वह आधार है जिससे मतदाताओं का मिलान होता है। चुनाव आयोग (ECI) को यह अधिकार लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 की धारा 21 से मिलता है, जो किसी भी समय विशेष पुनरीक्षण की अनुमति देती है।

इस बार नया यह है कि जिन मतदाताओं का मिलान नहीं हुआ, उन्हें दस्तावेज़ों से योग्यता साबित करनी होगी, और यह लगभग 18 महीनों में लगभग पूरे देश को कवर करता है।

SIR कदम-दर-कदम कैसे काम करता है?
  1. गणना: बूथ लेवल अधिकारी (BLO) पहले से भरा फ़ॉर्म देता है; मतदाता उस पर हस्ताक्षर करके लगभग एक महीने में लौटाता है।
  2. मसौदा मतदाता सूची: सिर्फ़ उन्हीं लोगों के नाम शामिल होते हैं जिन्होंने फ़ॉर्म लौटाया। बाक़ी को मृत, स्थानांतरित, दोहरी प्रविष्टि या लापता के रूप में दर्ज किया जाता है।
  3. मैपिंग: हर फ़ॉर्म का मिलान 2002–04 की मतदाता सूची से किया जाता है। अगर आप या आपके माता-पिता उसमें हैं, तो आपको कम या कोई दस्तावेज़ नहीं देने पड़ते।
  4. नोटिस: जिन मतदाताओं का मिलान नहीं हुआ, और जिन्हें "तार्किक विसंगति (logical discrepancy)" के लिए चिह्नित किया गया, उन्हें योग्यता का दस्तावेज़ देना होता है।
  5. सुनवाई: निर्वाचक रजिस्ट्रीकरण अधिकारी (ERO) नाम जोड़ने या हटाने का फ़ैसला करता है।
  6. अंतिम मतदाता सूची और अपील: अपील पहले ज़िला निर्वाचन अधिकारी के पास, फिर राज्य मुख्य निर्वाचन अधिकारी के पास जाती है। बंगाल में न्यायिक अधिकारियों के ट्रिब्यूनल बनाए गए।
क्या आधार मान्य है?

सिर्फ़ पहचान के सबूत के रूप में, नागरिकता के नहीं। चुनाव आयोग ने शुरू में इसे दस्तावेज़ों की सूची से बाहर रखा था; सुप्रीम कोर्ट ने आयोग से आधार, वोटर आईडी और राशन कार्ड पर विचार करने को कहा।

कौन-से राज्य शामिल थे, और कब?
  • बिहार पायलट: आदेश 24 जून 2025; अंतिम मतदाता सूची 30 सितंबर 2025।
  • चरण 2: उत्तर प्रदेश, पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु और केरल समेत 12 राज्य और केंद्रशासित प्रदेश, 27 अक्टूबर 2025 से।
  • चरण 3: महाराष्ट्र, दिल्ली, कर्नाटक और तेलंगाना समेत 19 राज्य और केंद्रशासित प्रदेश, 14 मई 2026 से। मसौदा सूचियाँ प्रकाशित हो चुकी हैं; अंतिम मतदाता सूचियाँ अभी बाक़ी हैं।
इसका समय चुनावों से कैसे जुड़ा था?

हर चरण का आदेश किसी बड़े चुनावी दौर से लगभग चार से पाँच महीने पहले दिया गया। बिहार के SIR का आदेश बिहार में मतदान से लगभग 4.4 महीने पहले दिया गया, और चरण 2 का पाँच राज्यों के चुनाव कार्यक्रम से लगभग 4.6 महीने पहले। चरण 3 मई 2026 के नतीजों के कुछ दिन बाद, 2027 के दौर से पहले शुरू हुआ। सुप्रीम कोर्ट ने जुलाई 2025 में इसके समय पर सवाल उठाए, लेकिन प्रक्रिया को नहीं रोका।

हटाए गए नाम और मतदाता सूची में वापसी

कितने नाम हटाए गए हैं?

अब तक तीनों चरणों में लगभग 11.7 करोड़, लगभग 95 करोड़ मतदाताओं के आधार में से:

  • बिहार: 7.89 करोड़ → अंतिम 7.42 करोड़, यानी शुद्ध 47 लाख की कमी (मसौदे में 65 लाख नाम हटे, लगभग 21.5 लाख वापस जोड़े गए)।
  • चरण 2: 50.99 करोड़ → 45.81 करोड़, यानी 5.18 करोड़ (10.2%) की कमी।
  • चरण 3: मसौदा चरण में 6 करोड़ से ज़्यादा (17%), जिनमें महाराष्ट्र में 2.06 करोड़ और दिल्ली की मतदाता सूची का 32.8% शामिल है। अंतिम आंकड़े अभी बाक़ी हैं।

चुनाव आयोग ने चरण 2 और 3 के लिए हटाए गए नामों के साथ जोड़े गए नाम प्रकाशित नहीं किए हैं, इसलिए शुद्ध आंकड़े घट सकते हैं।

संख्याएँ इतनी बड़ी क्यों हैं?
  • ज़िम्मेदारी मतदाता पर आ गई। अब नाम तब तक रहने के बजाय, जब तक कोई साबित न करे कि उसे हटना चाहिए, वह तब हट जाता है जब तक मतदाता खुद कदम न उठाए।
  • प्रवासी समय-सीमा चूक जाते हैं। गणना वाले महीने में घर से दूर काम कर रहे लोग फ़ॉर्म नहीं लौटा पाते।
  • असली सफ़ाई। चरण 2 में लगभग 67 लाख मृत मतदाताओं के नाम हटाए गए, साथ ही केंद्रीय डी-डुप्लीकेशन से पकड़ी गई राज्यों के बीच की दोहरी प्रविष्टियाँ भी।
  • बड़े पैमाने पर सॉफ़्टवेयर से चिह्नित मामले। नोटिस लाखों में बनते हैं और उन्हें कम समय-सीमा में निपटाना होता है।

चरण 2 में 5.18 करोड़ की कमी में से सिर्फ़ लगभग 1.3 करोड़ की वजह मौतें या निपटाई गई आपत्तियाँ हैं। बाक़ी ज़्यादातर वे लोग हैं जो मिले नहीं, स्थानांतरित हो गए, दोहरी प्रविष्टि वाले थे, या जिन्होंने फ़ॉर्म नहीं लौटाया।

क्या जिसका नाम हटाया गया, वह फिर से मतदाता सूची में आ सकता है?

हाँ। फ़ॉर्म 6 पर नए मतदाताओं के लिए लिखा होता है, लेकिन यह हर उस व्यक्ति का आवेदन है जिसका नाम मतदाता सूची में नहीं है: पहली बार के मतदाता, जगह बदलने वाले लोग, और वे लोग जिनके नाम हटाए गए।

29 सितंबर 2026 को चुनाव आयोग ने उन राज्यों (20 राज्य और केंद्रशासित प्रदेश) से, जहाँ SIR पूरा हो चुका है, कहा कि बाहर किए गए मतदाता फ़ॉर्म 6 से फिर आवेदन कर सकते हैं। इन आवेदनों पर SIR का अतिरिक्त घोषणापत्र अब लागू नहीं होता; यह सामान्य वैधानिक फ़ॉर्म है। अधिकारियों को SIR से पहले और बाद की मतदाता सूचियों की तुलना करके उन लोगों को खोजना होगा जिनके नाम पर्याप्त आधार के बिना हटाए गए, और BLO आवेदन भरवाने में मदद के लिए उनके घर जा सकते हैं। गोवा में अंतिम मतदाता सूची से छूटे 97 योग्य मतदाताओं में से 88 के नाम बहाल हो चुके हैं या उन्होंने आवेदन कर दिया है।

तो दोबारा नाम जुड़वाने में दिक़्क़त क्या है?
  • मतदाता को खुद पता लगाना और कदम उठाना होता है। जिसका नाम ग़लत तरीक़े से हटा, उसे यह पता करना होगा और नए मतदाता की तरह फिर आवेदन करना होगा।
  • हर चुनाव से पहले मतदाता सूची फ़्रीज़ हो जाती है। नामांकन बंद होने के बाद उस चुनाव के लिए किसी का नाम नहीं जोड़ा जा सकता। समय-सीमा चूकने का मतलब है उस चुनाव में वोट न दे पाना, भले ही बाद में नाम जुड़ जाए।
  • बीच में नियम बदल गए। SIR के दौरान फिर आवेदन करने वालों को अतिरिक्त घोषणापत्र देना पड़ा; 29 सितंबर के बाद आवेदन करने वालों को नहीं।
  • अपीलें धीमी हैं। बंगाल में ट्रिब्यूनल में 38 लाख अपीलों में से सितंबर 2026 तक लगभग 1.26 लाख पर फ़ैसला हुआ था।
मुझे लगता है मेरा नाम हटा दिया गया। मैं क्या कर सकता/सकती हूँ?
  1. चुनाव आयोग के मतदाता सेवा पोर्टल (voters.eci.gov.in) या अपने राज्य मुख्य निर्वाचन अधिकारी की वेबसाइट पर देखें कि आप मौजूदा मतदाता सूची में हैं या नहीं।
  2. अगर आपके राज्य में SIR पूरा हो चुका है और आपका नाम नहीं है, तो ऑनलाइन या अपने BLO के ज़रिए फ़ॉर्म 6 भरें। 29 सितंबर 2026 से SIR का अतिरिक्त घोषणापत्र ज़रूरी नहीं है।
  3. अगर आपके राज्य में SIR अभी चल रहा है (जैसे दिल्ली या महाराष्ट्र), तो दावे और आपत्तियों की अवधि में दावा दर्ज करें।
  4. अगर ERO ने सुनवाई के बाद आपका नाम बाहर किया है, तो आप ज़िला निर्वाचन अधिकारी के पास अपील कर सकते हैं।
  5. यह किसी भी चुनाव की घोषणा से काफ़ी पहले करें। नामांकन बंद होते ही मतदाता सूची फ़्रीज़ हो जाती है।

मौजूदा समय-सीमा के लिए अपने राज्य मुख्य निर्वाचन अधिकारी की वेबसाइट देखें; ये राज्य के हिसाब से अलग हैं और कई बार बढ़ाई जा चुकी हैं।

क्या कुछ समुदायों के नाम दूसरों से ज़्यादा हटाए गए?

स्वतंत्र विश्लेषणों के अनुसार दो जगह ऐसा हुआ। पश्चिम बंगाल में "तार्किक विसंगति (logical discrepancy) / न्यायनिर्णयन के अधीन (under adjudication)" श्रेणी में मुसलमानों का अनुपात बहुत ज़्यादा था, और नंदीग्राम में पूरक सूची से हटाए गए लगभग 95% नाम मुसलमानों के थे। बिहार में पुरुषों की तुलना में 7.6 लाख ज़्यादा महिलाओं के नाम हटाए गए। चुनाव आयोग किसी भी पक्षपात से इनकार करता है। ये आंकड़े नामों के आधार पर लगाए गए अनुमान पर टिके हैं और इनका स्वतंत्र ऑडिट नहीं हुआ है। हर दावे, चुनाव आयोग के जवाब और सावधानियों के लिए चरण 3, "किसके नाम हटे, इसके पैटर्न" देखें।

बंगाल की अपीलें किस बारे में हैं?

बंगाल ने SIR अपीलों की सुनवाई के लिए न्यायिक अधिकारियों के ट्रिब्यूनल बनाए। 38.3 लाख अपीलों में से 22.2 लाख उन मतदाताओं की थीं जिनके नाम बाहर किए गए, और 16.1 लाख में मतदाताओं के नाम जोड़े जाने को चुनौती दी गई, अक्सर ऐसे नाम जिन्हें न्यायिक अधिकारियों ने बहाल किया था। एक ट्रिब्यूनल जज ने कहा कि नाम जोड़ने के ख़िलाफ़ लगभग दस में से चार अपीलें चुनाव अधिकारियों ने दायर की थीं। सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका में आरोप है कि ये अपीलें दोनों चुनाव आयुक्तों या राज्य मुख्य निर्वाचन अधिकारी की जानकारी के बिना चुनाव आयोग के नाम से दायर की गईं।

फ़ॉर्म 6

फ़ॉर्म 6 क्या है?

यह मतदाता सूची में नाम जोड़ने का वैधानिक आवेदन है, जो निर्वाचक रजिस्ट्रीकरण नियम, 1960 में तय है। इसमें आपको दिखाना होता है कि आपकी उम्र 18 साल या उससे ज़्यादा है, आप नागरिक हैं और उस पते पर सामान्य रूप से रहते हैं। फ़ॉर्म में बदलाव के लिए क़ानून मंत्रालय को नियमों में संशोधन करना पड़ता है।

SIR के दौरान फ़ॉर्म 6 में क्या जोड़ा गया?
  1. जून 2025: फ़ॉर्म 6 और 8 के साथ एक अलग घोषणापत्र ("Annexure D") जोड़ा गया। ज़रूरी दस्तावेज़ जन्म तिथि पर निर्भर हैं, जो नागरिकता अधिनियम की कट-ऑफ़ तारीख़ों के मुताबिक़ हैं: 1 जुलाई 1987 से पहले जन्मे लोगों को अपना प्रमाण देना होगा; 1987–2004 के बीच जन्मे लोगों को एक माता-पिता का भी; 2004 के बाद जन्मे लोगों को दोनों माता-पिता का।
  2. बाद के चरण: एक सवाल जोड़ा गया कि क्या आप या आपके माता-पिता पिछले गहन पुनरीक्षण की मतदाता सूची में हैं। जुलाई 2026 से नए आवेदकों को माता-पिता का SIR ब्योरा भी लगाना होगा।
  3. 13 अगस्त 2026: एक और सवाल जोड़ा गया, जो आवेदकों को किसी पुरानी मतदाता सूची से जोड़ता है। चुनाव आयुक्त संधू ने इस पर आपत्ति जताई थी।
अगर घोषणापत्र के बिना ऑनलाइन फ़ॉर्म जमा ही नहीं होता, तो क्या फ़ॉर्म 6 असल में बदल नहीं गया?

व्यवहार में, हाँ। जब तक घोषणापत्र पूरा न हो, ऑनलाइन फ़ॉर्म 6 जमा नहीं होता था, और दोनों के लिए एक ही OTP था। ऑनलाइन आवेदकों के लिए घोषणापत्र पंजीकरण की शर्त बन गया, और इससे मतदाता सूची में नाम जुड़वाने के लिए ज़रूरी सबूत बदल गए।

क्या इससे यह क़ानूनी रूप से अवैध हो जाता है, यह दो और सवालों पर निर्भर है। पहला, सुप्रीम कोर्ट ने (मई 2026) SIR के दौरान घोषणापत्र माँगने के चुनाव आयोग (ECI) के अधिकार को सही ठहराया, इसलिए इसका अनिवार्य होना अपने आप में ग़ैरक़ानूनी नहीं है। दूसरा, बाद के बदलाव तीन में से दो आयुक्तों की आपत्ति के बाद आए; अगर पूरे आयोग ने कभी इन्हें मंज़ूरी नहीं दी, तो प्रक्रिया के आधार पर ये टिक नहीं सकते। कोर्ट ने 5 अक्टूबर 2026 को कहा कि उसने किसी संशोधित फ़ॉर्म 6 को मंज़ूरी नहीं दी है और रिकॉर्ड माँगे हैं।

क्या काग़ज़ी आवेदन भी घोषणापत्र के बिना ठुकराए गए, इसकी कोई रिपोर्ट नहीं है। अगर ऑनलाइन और काग़ज़ी प्रक्रिया अलग थी, तो आवेदकों को आवेदन के तरीक़े के हिसाब से अलग-अलग कसौटी का सामना करना पड़ा।

फ़ॉर्म 6 पर चुनाव आयोग क्या कहता है?

आयोग का कहना है कि फ़ॉर्म 6 में कभी बदलाव नहीं हुआ। जून 2025 के बिहार SIR आदेश के ज़रिए एक अलग घोषणापत्र जोड़ा गया, जिसे सर्वसम्मति से मंज़ूरी मिली और सुप्रीम कोर्ट ने सही ठहराया। आयोग के मुताबिक़ घोषणापत्र से मतदाताओं की मैपिंग में मदद मिलती है और काग़ज़ी काम कम होता है, और SIR के बाहर सामान्य फ़ॉर्म ही इस्तेमाल होता है। आयोग ने राहुल गांधी के इस दावे को "भ्रामक" बताया कि फ़ॉर्म 6 को ग़ैरक़ानूनी तरीक़े से बदला गया।

आंतरिक आपत्तियाँ

इंडियन एक्सप्रेस की पड़ताल में क्या सामने आया?

रिपोर्ट के मुताबिक़ चुनाव आयुक्त संधू और जोशी ने 10 महीनों में कम से कम 14 आपत्तियाँ औपचारिक रूप से दर्ज कीं, जिनमें चार एक ही दिन में थीं। ये आपत्तियाँ उन फ़ैसलों और आदेशों पर थीं, जो उनके अनुसार उनकी जानकारी के बिना या उनकी सिफ़ारिशों के ख़िलाफ़ जारी किए गए। आपत्तियाँ नए मतदाताओं के पंजीकरण, नाम हटाने और बहाल करने, अपील, और मतदाता सूची के डेटाबेस के नियंत्रण से जुड़ी थीं। कुछ मामले कैबिनेट सचिव तक ले जाए गए।

रिपोर्ट से पता चलता है कि आपत्तियाँ उठाई गईं। यह अपने आप में किसी ग़लत आचरण का सबूत नहीं है।

ERONet और ECINet क्या हैं, और ये क्यों मायने रखते हैं?

ERONet वह सिस्टम है जिसका इस्तेमाल निर्वाचक रजिस्ट्रीकरण अधिकारी (ERO) लंबे समय से नाम जोड़ने, हटाने और बहाल करने के लिए करते रहे हैं; क़ानून यह काम ERO को सौंपता है। रिपोर्टों के मुताबिक़ नवंबर 2025 से उनकी पहुँच सीमित कर दी गई। 22 जनवरी 2026 को शुरू हुआ ECINet चुनाव से जुड़ी सेवाओं को एक केंद्रीय प्लेटफ़ॉर्म पर लाता है। जोशी ने मतदाता सूची के डेटाबेस के "धीरे-धीरे केंद्रीकरण" की चेतावनी दी। सवाल यह है कि क्या अब मतदाता सूची में बदलाव वैधानिक अधिकारियों के बजाय केंद्रीय IT कर्मचारियों के हाथ में है।

कैबिनेट सचिव को लिखा गया पत्र क्या था?

यह 29 जुलाई 2026 का पत्र संधू और जोशी ने लिखा था। यह काम के बँटवारे में हुए उस बदलाव के बारे में था, जिससे IT डिवीज़न की निगरानी की एक परत हट गई। चुनाव आयोग का कहना है कि यह प्रतिनियुक्ति पर आए एक अधिकारी के कामकाज से जुड़ा था, जो रिपोर्टों के मुताबिक़ एक वरिष्ठ उप चुनाव आयुक्त हैं, न कि नीति या मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) से।

चुनाव आयोग ने क्या जवाब दिया है?

आयोग ने इन नोट्स के होने से इनकार नहीं किया है। उसका कहना है कि अलग-अलग राय विचार-विमर्श का सामान्य हिस्सा है और SIR के कार्यक्रम समेत सभी अंतिम फ़ैसले सर्वसम्मति से हुए। 26 सितंबर 2026 को तीनों आयुक्तों ने एक प्रेस नोट पर हस्ताक्षर किए, जिसमें घोषणा की गई कि एजेंडा पहले से भेजा जाएगा, बैठकों का ब्योरा (minutes) जारी होगा, और ECINet की क़ानूनी अनुपालन के लिए समीक्षा होगी।

क्या मुख्य चुनाव आयुक्त को बाक़ी दो आयुक्तों की सहमति चाहिए?

हाँ, आयोग के फ़ैसलों के लिए। 2023 का अधिनियम और सुप्रीम कोर्ट का टी.एन. शेषन फ़ैसला आयोग को बहु-सदस्यीय संस्था मानते हैं: जहाँ तक संभव हो काम सर्वसम्मति से होता है, वरना बहुमत से। 5 अक्टूबर 2026 को कोर्ट ने दोहराया कि फ़ैसले सर्वसम्मति या बहुमत से होने चाहिए। याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि दो आयुक्तों की दर्ज आपत्तियों के बावजूद उठाए गए क़दम इसलिए अमान्य हैं।

मार्च 2024 के बाद नियमों में अन्य बदलाव और इनकार

ज्ञानेश कुमार और संधू के आने के बाद चुनाव के कौन से नियम बदले?
  • मई 2024: चुनाव आयोग ने सुप्रीम कोर्ट से कहा कि वह लोकसभा चुनाव के दौरान बूथ-वार मतदान (फ़ॉर्म 17C) प्रकाशित नहीं कर सकता।
  • 20 दिसंबर 2024: चुनाव आयोग की सिफ़ारिश पर नियम 93(2)(a) को सीमित किया गया, जिससे CCTV और वीडियो रिकॉर्ड अब जनता के निरीक्षण के लिए उपलब्ध नहीं हैं। यह हाई कोर्ट के उस आदेश के बाद हुआ, जिसमें हरियाणा चुनाव की फ़ुटेज जारी करने को कहा गया था।
  • मई 2025: हर बूथ पर अधिकतम 1,200 मतदाता (पहले 1,500), रजिस्ट्रार जनरल से मृत्यु रिकॉर्ड जोड़ना, और बूथ पर मोबाइल फ़ोन जमा कराने की व्यवस्था।
  • 30 मई 2025: मतदान की CCTV और वेबकास्ट फ़ुटेज 45 दिन बाद नष्ट की जाएगी, जब तक कोई चुनाव याचिका दायर न हो।
  • जून 2025 से आगे: SIR और फ़ॉर्म 6 का घोषणापत्र।
चुनाव आयोग ने कौन सी माँगें ठुकराई हैं?
  • 2024 के लोकसभा चुनाव के दौरान फ़ॉर्म 17C का मतदान डेटा।
  • आलंद में नाम हटाने का डेटा: कर्नाटक CID ने जनवरी–अप्रैल 2025 में डिवाइस के IP और पोर्ट का ब्योरा माँगा, पर जवाब नहीं मिला, जिससे जाँच अटक गई।
  • जून 2025 में राहुल गांधी ने महाराष्ट्र की CCTV फ़ुटेज माँगी, जिसे मतदाताओं की निजता और जनप्रतिनिधित्व अधिनियम (RP Act) का हवाला देकर ठुकराया गया। मशीन से पढ़ी जा सकने वाली मतदाता सूची के बारे में आयोग ने उन्हें मौजूदा नियमों के तहत पैसे देकर प्रतियाँ लेने को कहा।
  • "वोट चोरी" के आरोप: अगस्त 2025 में मुख्य चुनाव आयुक्त ने कहा कि अगर सात दिन में हलफ़नामा नहीं दिया गया, तो इन्हें निराधार माना जाएगा।
क्या ये सभी बदलाव अकेले ज्ञानेश कुमार ने किए?

सभी नहीं। फ़रवरी 2025 तक राजीव कुमार मुख्य चुनाव आयुक्त थे, इसलिए 2024 के फ़ैसले तीन सदस्यों वाले आयोग के थे, जिसमें ज्ञानेश कुमार और संधू शामिल थे। नियम 93 का बदलाव चुनाव आयोग की सिफ़ारिश पर क़ानून मंत्रालय ने अधिसूचित किया था। 2025–26 के विवादित क़दम वही हैं, जिनके बारे में दोनों चुनाव आयुक्त कहते हैं कि वे उनके बिना उठाए गए।

अदालतें, विरोध प्रदर्शन और आगे क्या

अभी सुप्रीम कोर्ट में कौन से मामले हैं?
  • राकेश कुमार सिंह की जनहित याचिका: मुख्य चुनाव आयुक्त के निलंबन, अधिकार-पृच्छा (quo warranto) रिट और यह घोषणा माँगती है कि उनके एकतरफ़ा क़दम अनधिकृत हैं।
  • शैलेंद्र मणि त्रिपाठी की जनहित याचिका: पूरे आयोग के बिना लिए गए फ़ैसलों और सॉफ़्टवेयर बदलावों को रद्द करने, और आपराधिक कार्यवाही की माँग करती है।
  • अवमानना: एक वकील ने मुख्य चुनाव आयुक्त के ख़िलाफ़ आपराधिक अवमानना की कार्यवाही के लिए अटॉर्नी जनरल की सहमति माँगी है।
  • 2023 का नियुक्ति क़ानून: बड़ी पीठ पर भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) के फ़ैसले का इंतज़ार है।
  • बंगाल SIR के मामले, जिनमें ट्रिब्यूनल अपीलों पर डेरेक ओ'ब्रायन की अर्ज़ी भी शामिल है।
सुप्रीम कोर्ट ने 5 अक्टूबर 2026 को क्या कहा?

कोर्ट ने चुनाव आयोग और केंद्र को नोटिस जारी कर एक हफ़्ते में जवाब माँगा। कोर्ट ने कहा कि आयोग के फ़ैसले सर्वसम्मति या बहुमत से होने चाहिए, और फ़िलहाल यह माना कि ऐसा ही हुआ। कोर्ट ने कहा कि उसने किसी संशोधित फ़ॉर्म 6 को मंज़ूरी नहीं दी है और रिकॉर्ड माँगे। उसने मुख्य चुनाव आयुक्त के ख़िलाफ़ अंतरिम राहत देने से इनकार किया। राहुल गांधी ने कहा कि अब ग़ैरक़ानूनी होना साबित हो गया है; चुनाव आयोग और भाजपा ने इसे ग़लत व्याख्या बताया।

कौन से विरोध प्रदर्शन हुए हैं?

विपक्षी दलों ने 26 सितंबर से 2 अक्टूबर तक देशभर में विरोध प्रदर्शन किए। यूथ कांग्रेस ने दिल्ली में प्रदर्शन किया। इंडिया गठबंधन के सांसदों ने 6 अक्टूबर को चुनाव आयोग तक मार्च निकाला। 10–11 अक्टूबर को युवाओं के नेतृत्व वाली कॉकरोच जनता पार्टी ने भारी सुरक्षा के बीच दिल्ली में प्रदर्शन किया; रिपोर्टों के मुताबिक़ 7,000 से ज़्यादा लोगों को हिरासत में लिया गया।

आगे क्या होगा?
  • सुप्रीम कोर्ट में चुनाव आयोग और केंद्र के जवाब 5 अक्टूबर के लगभग एक हफ़्ते बाद तक देने थे; इसके बाद कोर्ट मामले पर सुनवाई करेगा।
  • भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) को तय करना है कि 2023 के नियुक्ति क़ानून की चुनौती पर बड़ी पीठ सुनवाई करेगी या नहीं।
  • 73 सांसदों का हटाने का नोटिस राज्यसभा के सभापति के पास लंबित है।
  • चरण 3 की अंतिम मतदाता सूची 2026 में आगे आनी है; महाराष्ट्र में दावे 12 अक्टूबर और दिल्ली में 30 अक्टूबर को बंद होंगे।
यह पेज कितना भरोसेमंद है?

हर जवाब सार्वजनिक रिपोर्टिंग से जुड़ा है, ज़्यादातर राष्ट्रीय मीडिया और क़ानूनी ख़बरों की साइटों से। इंडियन एक्सप्रेस की पड़ताल पेवॉल के पीछे थी, इसलिए उसका हवाला उन दूसरे मीडिया संस्थानों के ज़रिए दिया गया है जिन्होंने उसकी रिपोर्ट की। कुछ आँकड़े, जैसे चरण 3 में हटाए गए नाम, मसौदा चरण के हैं और बदलेंगे। पहले हुए गहन पुनरीक्षणों का इतिहास और 2027 के चुनाव की संभावित अवधि सामान्य संदर्भ स्रोतों से ली गई है। जहाँ चुनाव आयोग किसी दावे पर असहमत है, वहाँ उसका पक्ष भी साथ में दिया गया है।

हर पक्ष इसे कैसे देखता है

चुनाव आयोग और सरकार

  • 2023 का अधिनियम वैध क़ानून है। 70 साल तक कार्यपालिका द्वारा चयन ही चलन था। The Week
  • मतदाता सूचियों में मृत, स्थानांतरित और दोहरे मतदाता भरे हुए थे। चुनाव से पहले इन्हें साफ़ करना ज़रूरी था। AIRDeccan Herald
  • SIR का हर कार्यक्रम सर्वसम्मति से मंज़ूर हुआ। सुप्रीम कोर्ट ने मई 2026 में बिहार के ढांचे को सही ठहराया। RepublicFree Press Journal
  • आयोग के भीतर मतभेद सामान्य विचार-विमर्श का हिस्सा हैं। एजेंडा और कार्यवृत्त अब अनिवार्य हैं। ThePrintNewsBytes

विपक्ष और याचिकाकर्ता

  • यह पैनल सरकार को तय करने का नियंत्रण देता है कि चुनाव कौन कराएगा। The WireSouth First
  • चुनाव से कुछ महीने पहले मतदाता सूची दोबारा बनाने से ग़लत तरीक़े से हटाए गए मतदाताओं को वापस जोड़ने का समय कम बचता है। Patna PressSC Observer
  • सबूत देने का बोझ मतदाताओं पर डाल दिया गया, और "नहीं मिला" होना अयोग्यता का सबूत नहीं है। Janata WeeklyTribune
  • अहम क़दम तीन में से दो आयुक्तों के बिना उठाए गए, इसलिए उन्हें रद्द किया जाना चाहिए। NE NowDeccan ChronicleThe Week